बगहा। मानसून की फुहारों से लेट फिर भी पुरवैया हवाओं के बीच खेतों में धान की रोपनी का कार्य महिलाओं के द्वारा जोर-शोर से चल रहा है। इस दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं ने पारंपरिक लोकगीत गाकर खेती-किसानी के उत्सव को जीवंत कर दिया। खेतों में रोपनी करती महिलाओं की मधुर आवाज से पूरा माहौल लोक संस्कृति के रंग में रंग गया।
धान की रोपनी के दौरान महिलाओं ने पुरवैया हवाओं, हरियाली, बारिश और अच्छी फसल की कामना से जुड़े पारंपरिक गीत गाए। इन गीतों में ग्रामीण जीवन, प्रकृति और कृषि संस्कृति की झलक साफ दिखाई दी। खेतों में काम के साथ गीत-संगीत का यह संगम किसानों के श्रम को उत्सव में बदलता नजर आया।
ग्रामीणों ने बताया कि धान रोपनी के समय लोकगीत गाने की परंपरा वर्षों पुरानी है। इससे काम करने वालों का उत्साह बढ़ता है और आपसी भाईचारा भी मजबूत होता है। बदलते समय के बावजूद कई गांवों में यह परंपरा आज भी जीवित है।
इस दौरान अपने खेतों में धान की रोपनी करते हुए जदयू नेत्री निवेदिता मिश्रा पश्चिम चंपारण जिला के सेमरा थाना स्थित अपने गांव से कहा कि भारत देश कृषि प्रधान देश है । जहां सदियों पुरानी परम्पराओं को सहेज कर रखा है। और इसको आज भी जीवित रखा है। वहीं रोपनी के गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि यह हमारी लोक संस्कृति और कृषि परंपरा की अमूल्य धरोहर हैं। खेतों में गूंजते इन गीतों ने एक बार फिर ग्रामीण जीवन की सादगी, संस्कृति और प्रकृति से जुड़ाव को जीवंत कर दिया।












