बगहा दो प्रखंड के नौरंगिया दरदरी पंचायत के नौरंगिया गांव में हर साल की तरह इस बार भी वैशाख नवमी के दिन ‘घर बहरी’ की परंपरा निभाई गई। थारू जनजाति के लोगों ने सूर्य उगने से पहले गांव छोड़ दिया और सूर्यास्त तक 12 घंटे जंगल में बिताए।
शनिवार को सुबह होते ही गांव में पूरी तरह सन्नाटा छा गया। न तो कोई ग्रामीण गांव में था और न ही पालतू जानवर। सभी लोग अपने-अपने घरों को छोड़कर पालतू पशुओं के साथ जंगल की ओर निकल गए। पूरे दिन जंगल में समय बिताने के बाद सूर्यास्त के बाद सभी ग्रामीण वापस अपने घर लौट आए।
ग्रामीणों के अनुसार नौरंगिया गांव में 100 साल से भी अधिक समय से यह वनवास की परंपरा ‘घर बहरी’ के रूप में चली आ रही है। माना जाता है कि इस परंपरा का पालन करने से देवी के प्रकोप से मुक्ति मिलती है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि कई साल पहले गांव प्राकृतिक आपदाओं और महामारियों से प्रभावित था, जिसके बाद इस परंपरा की शुरुआत हुई।
इस दौरान सुरक्षा की दृष्टि से नौरंगिया थानाध्यक्ष राज रौशन पूरे दिन जंगल का भ्रमण करते रहे। साथ ही मेला और आसपास के क्षेत्रों में पुलिस की तैनाती भी की गई थी।
ग्रामीणों के बीच यह भी मान्यता है कि बाबा परमहंस साधु को देवी मां का सपना आया था, जिसमें उन्होंने पूरे गांव को वनवास पर जाने का निर्देश दिया था। तभी से हर साल इस परंपरा का पालन किया जाता है।
नए पीढ़ी के युवा भी इस परंपरा को निभा रहे हैं। स्नातक पास ग्रामीण युवक धर्मेंद्र कुमार ने बताया कि एक दिन के वनवास से गांव में शांति बनी रहती है, इसलिए वे लोग इस परंपरा को आज भी जारी रखे हुए हैं।
भारतीय थारू कल्याण महासंघ के नेता महेश्वर काजी का भी मानना है कि इस वनवास के कारण गांव में दैविक प्रकोप नहीं आता और ग्रामीण शांति से जीवन व्यतीत करते हैं।
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