चनपटिया । नई दिशा डिजिटल न्यूज
जब विकास का शोर मानवीय संवेदनाओं को कुचलने लगे, तो चनपटिया जैसी रूह कंपा देने वाली घटनाएं सामने आती हैं। यहां करोड़ों के निर्माण कार्यों के बीच बरती गई प्रशासनिक और ठेकेदारी की घोर लापरवाही ने एक 8 साल की मासूम बच्ची को मौत के मुंह में धकेल दिया। यह महज एक सामान्य हादसा नहीं है, बल्कि एक भ्रष्ट सिस्टम द्वारा की गई हत्या है, जिसमें रसूखदार ठेकेदार और संवेदनहीन जनप्रतिनिधि बराबर के भागीदार नजर आते हैं।
क्षेत्र में चल रहे निर्माण कार्यों में सुरक्षा मानकों को पूरी तरह ताक पर रख दिया गया है। निर्माणाधीन स्थल पर न तो उचित बैरिकेडिंग की गई थी और न ही कोई चेतावनी बोर्ड लगाया गया था, जिसके कारण बारिश के पानी से भरे ये गहरे गड्ढे एक मासूम के लिए मौत का जाल बन गए। सबसे शर्मनाक पहलू तो यह है कि हादसे के तुरंत बाद अपनी गर्दन बचाने के लिए प्रशासन और ठेकेदार ने रातों-रात वहां सुरक्षा जाली लगाने का ढोंग किया। यह लीपापोती साफ दर्शाती है कि जिम्मेदार पक्षों को अपनी जानलेवा गलती का भली-भांति अहसास था, फिर भी उन्होंने किसी मासूम की जान जाने का इंतजार किया।
जनप्रतिनिधियों की क्रेडिट की राजनीति और संवेदनहीन चुप्पी
इस पूरे प्रकरण में सबसे दुखद और आक्रोशित करने वाला पहलू स्थानीय नेताओं का रवैया रहा है। जहां एक गरीब परिवार अपनी मासूम बच्ची को खोने के गम में चीख रहा है, वहीं क्षेत्र के माननीय जनप्रतिनिधि इन दिनों डिग्री कॉलेज की उपलब्धियों का क्रेडिट लेने और फोटो खिंचवाने में मशगूल हैं। जो नेता चुनाव के समय गरीबों की चौखट चूमते नहीं थकते थे, आज वे इस पीड़ित परिवार को सांत्वना देने तक नहीं पहुंचे। स्थानीय लोगों का सीधा आरोप है कि ठेकेदारों के रसूख और आर्थिक प्रभाव के आगे जनप्रतिनिधियों की जुबान सिल गई है और उनके लिए जनता की जान से ज्यादा जरूरी अपनी झूठी वाहवाही और फोटो सेशन बन गया है।
आज पीड़ित परिवार न्याय के लिए दर-दर भटक रहा है, लेकिन रसूखदारों के गठजोड़ के सामने उनकी आवाज दबती हुई प्रतीत होती है। इस मामले में केवल कागजी जांच या मुआवजे की घोषणा काफी नहीं है। मांग यह है कि दोषी ठेकेदार पर तत्काल गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार किया जाए और संबंधित निर्माण एजेंसी का लाइसेंस रद्द कर उसे ब्लैकलिस्ट किया जाए। साथ ही, क्षेत्रीय विधायक और अन्य नेताओं को यह स्पष्ट करना होगा कि वे जनता के सेवक हैं या फिर मौत के ठेकेदारों के संरक्षक।
चनपटिया की यह घटना समाज और सत्ता के चेहरे पर एक काला धब्बा है। यदि आज इन मौन बैठे नेताओं और लापरवाह ठेकेदारों की जवाबदेही तय नहीं की गई, तो कल फिर कोई मासूम इसी तथाकथित विकास की भेंट चढ़ जाएगा। अब समय आ गया है कि जनता इन फोटोजीवी नेताओं से सीधा सवाल पूछे कि उनके लिए एक गरीब की जिंदगी की कीमत करोड़ों के ठेकों और कमीशन से कम है? जब तक सिस्टम की जड़ें नहीं हिलेंगी, तब तक इंसाफ की उम्मीद बेमानी है।


